इस बार भी संसद में रहेगा सवर्ण सांसदों का दबदबा

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

इस बार भी संसद में रहेगा सवर्ण सांसदों का दबदबा

संजय कुमार ओझा, हिंदी पट्टी में पिछले एक दशक में संसद में सवर्णों का दबदबा तेजी से बढ़ा है। मंडल आयोग के दौर के बाद मंदिर और हिंदुत्व का दौर आते-आते भारतीय राजनीति में सवर्णों को राजनीतिक दलों ने हाथों हाथ लिया। इसमें भाजपा ने सबसे ज्यादा सवर्ण जाति के नेताओं को अपना उम्मीदवार बनाया है। पार्टी में दस साल में ब्राह्मण सांसदों की संख्या बढ़ी है।1990 में मंडल कमिशन के बाद संसद में ओबीसी प्रतिनिधियों की संख्या 11 प्रतिशत से बढ़कर 22 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। इस दौर में सपा, बसपा और कांग्रेस ने पिछड़ी जातियों पर जमकर दांव लगाया। ब्राह्मण व बनिया की पार्टी मानी जाने वाली भाजपा भी इस वर्ग से किनारा नहीं कर सकी। इसकी काट के लिए 1991 में यूपी की राजनीति के फलक पर भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री के तौर पर कल्याण सिंह का उदय हुआ। लेकिन, 2009 आते-आते हिंदुत्व और भाजपा का प्रभाव बढ़ा, तो सवर्णों का राजनीति में दखल बढ़ने लगा।2014 चुनाव के नतीजों में मंडल से पहले वाला राजनीतिक परिदृश्य साफ दिखने लगा। यह वो दौर था, जब पिछड़ी जाति को लेकर कुछ नया नहीं हो रहा था। इसके अलावा पिछड़ी जाति के लोग जाति आधारित दलों में बंटने लगे थे। यूपी में सपा और बिहार में राजद यादवों, तो बसपा जाटवों और जदयू कुर्मियों की पार्टी के रूप में अपनी पहचान बना   चुकीं थी। हालांकि, इस दौरान भाजपा के उत्थान को भी नकारा नहीं जा सकता है। जैसे-जैसे कट्टर हिंदुत्व के नेताओं की अगुवाई में मंदिर मुद्दे को धार दी गई। वैसे-वैसे जाति और वर्ग का किला ध्वस्त होता चला गया। इसके बाद भाजपा ने चुनाव में बड़ी संख्या में सवर्ण उम्मीदवार उतारने शुरू किये। 2019 में हिंदी पट्टी के 199 संसदीय सीटों पर भाजपा ने 88 अगड़े प्रत्याशी मैदान में उतार दिए, इसमें 80 निर्वाचित हुए। वहीं भाजपा यूपी में योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी के साथ राजपूत बिरादरी में भी पैठ में कामयाब रही। 2009 में 30 प्रतिशत ब्राह्मण सांसद 2014 में 38.5 प्रतिशत हो गए। इसी तरह 2019 में ये बड़ी संख्या में जीतकर संसद पहुंचे हैं। राजपूतों की बात करें तो इनकी संसद में चमक फीकी पड़ी है। 2009 में 43 प्रतिशत जीते सांसद 2014 में 34 प्रतिशत पर आ गए। लेकिन, भाजपा के हिंदी पट्टी के 199 उम्मीदवारों में 37 ब्राह्मण व 30 राजपूत थे। जबकि 2014 में 33 ब्राह्मण और 27 राजपूत सांसद चुने गए थे। इस दौरान पिछड़ी जाति के सबसे ज्यादा उम्मीदवार यादव जाति के हारे, क्योंकि भाजपा ने अन्य जाति के उम्मीदवार मैदान में उतारे, जिससे वोटों का बिखराव हो गया। इससे पिछड़ी जाति का आंकड़ा 2009 से 2019 में बीच गिरकर 29 प्रतिशत से 16 प्रतिशत पर आ गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *